ये कैसा विकास

अमन व शांति का गहवारा कहलाने वाला मात्र एक ऐसा शहर है मुंब्रा- कौसा जिसकी तुलना मुंबई, ठाणे या आस- पास के किसी भी जिला या शहर से नहीं की जा सकती। शांति का प्रतीक कहलाने वाले इस शहर को हमेश तिरछी नजरों से देखा गया है। स्थानीय निवासियों को याद होगा कि वर्ष 1992 के मुंबई दंगों के दौरान जहां एक तरफ मुंबई जल रही थी, वहीं दूसरी तरफ मात्र 30 कि.मी. की दूरी पर शहर मुंब्रा चैन की नींद सो रहा था। दंगों के दौरान मुंब्रा-कौसा में लड़के हो या लड़कियां रात में करीब 2 बजे तक बेखौफ सड़कों पर चलते देखे गये हैलड़के हो या लड़कियां उन पर कभी भी एक कंकडी मारने की खबर न सुनी गई और न किसी अखबार में पढ़ी गई। वर्ष 1986 में पहली बार मुंब्रा- कौसा को ठाणे मनपा की हद में लाया गया। मुंब्रा-कौसा ठाणे मनपा में आने के बाद कई नगरसेवक यहां से चुनकर ठाणे मनपा की महासभा में पहुंचे। यह शहर कॉरपोरेशन ये कैसा में शामिल तो हो गया, लेकिन मूल भूत सुविधाओं के लिए उसे हमेशा धरना प्रदर्शन करने की जरूरत पड़ी और आज भी इस शहर को मूलभूत सुविधाओं से वंचित है। वर्ष 1986 व 2009 के बीच कई सांसद भी चुने गए, कई विधायक भी चुने गए लेकिन सभी ने इस शहर को नजर अंदाज कर दिया और समस्याएं हमेशा अपना मुंह फाडे प्रतिक्षा करती रही। वर्ष 2009 में नाम मात्र सेक्युलर पार्टी कहलाने वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार जितेन्द्र आव्हाड चुनाव जीत गए। उनके विधायक बनने के बाद शहर की अवाम में एक नयी उम्मीदें जागी, उन्हें लगा कि अब हमारे शहर का कायाकल्प हो जाएगा। शहरवासियों की उम्मीदों पर उस वक्त पानी फिर गया जब विधायक जी ने सिर्फ विकास नाम की फूलझडियां छोड़ने लगे। विकास तो दूर की बात रही विनास कार्य जंगी पैमाने पर चल पड़ा। वर्ष 2009 से पहले इस शहर में सिर्फ चार मंजिलों का अवैध निर्माण किया जाता था, लेकिन उसके बाद से ही 8 से 9 मंजिला अवैध इमारतों का निर्माण होने विकास लगाइसे रोकने में जब शासन प्रशासन और सामाजिक संस्थाएं नाकाम रहे तो अवैध निर्माणों पर रोक लगाने में ऊपर वाले को हस्तक्षेप करना पड़ा। वर्ष 2013 में लकी कंपाउण्ड की 7 मंजिला इमारत तास के पत्तों की तरह बिखर गई। इस दुर्घटना में 74 लोगों की मौत और 62 जख्मी हो गए। इसके बाद मुंब्रा-ठाणे तो क्या पूरे महाराष्ट्र भर में अवैध निर्माणों पर विराम लग गया। लकी कंपाउण्ड की दुर्घटना के बाद फिर एक नयी फुलझडी छोड़ी गई कि अब हम इस शहर में कलेस्टर योजना लाएंगे और सबके मकानों को हम लीगल करवाएंगे। कई साल तक चली इस फूलझडी का मामला पिछले दो तीन सालों से ठंडे बस्ते में चला गया। अब फिर 2019 का विधानसभा चुनाव सिर पर है। बड़े पैमाने पर विकास की पूड़ी बड़े-बड़े होर्डिंग और विज्ञापनों में छोडी जा रही है। होर्डिंग और विज्ञापनों से जब संतुष्टि नहीं मिल तो "मुहर विकास पर' नामी मैगजीन में अनलगढ़ तस्वीरें छापकर यहां की अवाम को लुभाने की कोशिश की जा रही है। उक्त मैगजीन में कछ ऐसे भी विकास कार्य को दर्शाए गए है जो इनके कार्य क्षेत्र में आता नहीं वहां के विकास का भी श्रेय विधायक स्वयं ले रहे है। लाखों रुपए खर्च कर तैयार की गई होर्डिंग को विधायक जी घर-तक पहुंचाने का प्रयास कर रहे है। जबकि शहरवासियों को विकास की तस्वीर मैगजीन में नहीं बल्कि विकास को जमीन पर देखना चाहते है। मैगजीन को लेकर सूझ-बूझ रखने वालों में यही चर्चा चल रही है कि अगर विधायकजी ने वास्तव में विकास किया तो उन्हें इतनी बड़ी-बड़ी होर्डिंग, अखबारों विज्ञापन तथा लाखों रूपए मैगजीन में खर्च कर प्रचार करने की जरूरत क्या है। उनका मानना है कि विकास पुरूष कभी विकास ढिंढोरा नहीं पीटता और न ही उसे ज्यादा माथापच्ची की जरूरत पड़ती है। अब इस खेल को लोग समझने भी लगे है। विकास पुरूष का अनदेखे विकास पर लोग यह कहने लगे है कि ये कैसा विकास है? इसके अलावा पिछले 10 सालों में लोगों के अंदर भाईचारा, प्यार, मोहम्मब, एकता अंखडता में कितनी खटास आई है उसका भी लोगों अंदाजा हैएक सेर अर्ज है कि मोहब्बत करने वालों में, यह झगड़ा डाल देती है। सियासत दोस्ती की जड़ में, मठ्ठा डाल देती है।।